Feeds:
المقالات
تعليقات

Archive for the ‘قصص في زمن الغبار’ Category

* مـهـمـة  سـريـّه  *

بقلم : عابر سبيل

 

أحد العارفين  ببواطن الأمور , أخ أو ابن عم , كان  يحدث أنه ما زال  برغم السنين , يذكر تلك  الليلة  بكل  تفاصيلها.  قال إنه  بعد الدفن  بقليل شاهد  بنفسه  نجمة  هبطت  قبيل  الفجر , وانطفأت  على الضريح .. بعدها  انشق القبر ,  فحملت النجمة ُ الجنازة َ ومضت  بها  إلى  بيتها ..

آخر من الآخَرَيْن  اختلفت الرواية  عنه . قيل  إنه كان  يزعم  بأن الذي  حدث  بعد  هبوط  النجمة, هو أن  الجنازة  قامت من  قبرها  الملاصق  لسياج  حاكورة  العائلة ,  بين  شجيرة  السماق  والدالية ,  وكان  عليها  ثياب غير تلك  التي  دفنت  فيها , ثم  مشت  غربًا , بمحاذاة  صف  شجرات  الصنوبر , الى أن  بلغت  الصخرة  الشاهقة , المطلة  على  السواحل  الغربية .. هناك  وقفت  موليةً  ظهرها  للدنيا , تديم  النظر  في  الأفق ..

وقتها  بالضبط  هبط  طائر أخضر , حملها  بين  جناحيه  وطار إلى  أن  غاب  في  أعالي  السماء ..

rfq62905

 

جاوز  باب  المغارة  خارجًا .. كان  الليل  قد  تمكن  من  الكون , شاملا  متكاملا , كأنه غطاء  الجحيم .. السكون  رهيب , كذاك الذي  يعقب الانفجارات  المدويه .. لا يقطعه غير الارتطام  بالارض  لقطرات  الماء  تسح من  على  أوراق  الشجر , مثل  أيام  تنفلت , كما خفية ً , من  شجرة  العمر ..

 

كان  نهار  ذلك  اليوم  تعيسًا  من  بدايته .. صارت  فجرًا  ولكن  الشمس  لم  تطلع .. وجه  الكون  أسود  مثل  وجه  المصيبة .. والآفاق  كالحة  مثل  وجوه  الكفار  في  جهنم ..  كانت  السماء  كأنها  تشققت .. والغيوم  كأنها  تخرقت , فانصبت  الأمطار  تجلد  ظهر  الأرض  بقسوة , كأنها  تقيم عليها  حدًا , أو كأن  بين السماء والأرض ثأر ٌ  قديم ..

بعيد  العصر  بقليل  ظهرت  على  وجه  الأرض  برك ٌ معكوره  من  المياه .. كان  المطر  قد  تلاشى رويدًا  رويدًا  كأنه  جيش  يغادر  ساحة  الحرب  بعد  أن  انتصر  ورواها  بالدماء ..

في الأفق  الغربي  بقعة  مثل  آثار  الحـنـّاء .. تحاول  الشمس  أن  تمارس  عادتها  السرمدية  في الاستعراض , إلا  أن  السحب  تحول  بينها  وبين  ذلك , مثل  زوج  غيور ..

عصفور  صغير  مذعور  يطلق  زعقة ً مرتجفة ً , كأنه  يبحث  عن  رفيقه  قبل  أن  يستبد  الظلام ..

 

مشى  بحذر ٍ  وَجِلا  باتجاه  سياج  الاسلاك  الشائكة  حتى  كاد  يلمسه.. من  هناك  بدت  له  أضواء  مدينته  على  طول  الساحل ..

dvf29tmp

كم  هو عميق ٌ جرحه ..

كم  هي  متوحشة ٌ حسرته ..

كم  هي  قريبة .. ولكن  ما  أبعدها .. تلك المدينة  التي  يحفظ  ما زال  كل  شوارعها  وزقاقاتها .. المدينة  التي أخرج  منها  في  تلك  النقطة  من  الزمن  وقت  أن  تم  الإعتداء  على الله , وحقنت  شرايين  التاريخ  بالسموم  لتزويره ..

لقد  مضى أكثر  من  نصف عمره , وحلمه  بالعودة  يزداد  ضمورًا  مع  السنين ..

أحيانًا  كثيره  كاد  القهر  يقتله , وقت  أن  كان  يتذكر  هؤلاء  الذين  وعدوه  بأن  يعيدوه  إلى  مدينته , لكنه  رآهم  مع  الأيام  يتنكرون  حتى  لمدائنهم ..!

وضع  رشاشه  على  الأرض برفق  المحب ..عالج  الاسلاك  بأداة  صغيرة , حتى  شق  فرجة  مربعة  في السياج ..  قص  محيط  أضلاعها إلا  السفلي .. أمسك  بالقطعة  المقصوصة  وشدها  نحوه  مرتين أو ثلاث , حتى صارت  أسلاك  الضلع  السفلي  مرنة  لينه .. أعادها  إلى  مكانها  وربط  أعلاها  بسلك , لا  بإحكام , .. أخذ  رشاشه  وبذات  الحذر  مشي  إلى الوراء  نحو  المغارة ..

 

لا  يعرف  بالضبط  كم انتظر  إلى أن  دنت من  الواحدة  بعد  منتصف الليل , ولا كم  مئة مرة  اصطكت أسنانه  من البرد. انتفض  قلبه  وقت  أن  صار  عليه  الشروع  بالمهمة , لكنه  لم  يفكر  لحظة  في التراجع .. علق الرشاش  على  ظهره .. احتضن  الكيس  بكلتا  يديه  وعاود  المشي  نحو الجنوب .. كان  الكيس  ثقيلا  جدًا , أو ربما  كان  خوفه  هو  ما  جعله  يشعر  بثقل  مضاعف للكيس .. غاصت  قدماه  في  الوحل  مرارًا .. وأخرى  ترنح  والكيس,  يمنة ً  ويسرة , إلى  أن  بلغ  الفرجه .. هناك  وقف  ليلتقط  أنفاسه .. أحس  بملوحة  العرق  في  زوايا  فمه , وفجأة  ظهرت أضواء  سيارة  تقترب  من  الغرب , على  الشارع  الترابي  المحاذي  للحدود..

أصابه  الذهول  وحالة  من  الدهش .. هي  دورية  عسكرية  لحرس  الحدود .. ولكن  لم  يكن  هذا  موعدها  بحسب  ملاحظاته .. لماذا  يعانده  القدر  منذ  ليلة  الامس ؟!

هبط  على  الأرض  قعودًا , ومن  ثم  دحرج  نفسه  والكيس  مع  المنحدر  حتى  استقر  في  الاسفل , بين  جداديع  البلان , الكيس  فوقه  ورشاشه  من  تحته..!

أحس  بخدر  شديد  في عضلات  جسمه , كأن  الدماء  توقفت  عن  السيلان  في  عروقه .. تملكه  شعور هو  خليط  من  الرعب  والعجز  والبرد .. صحيح  أنه  قد  عايش  الخطر  كثيرًا  فيما  مضى , ولكن  الوضع  الآن  مختلف  جدًا..

ترى  هل رأوه , أم  أكتشفوا  الفرجة  فنصبوا  له  كمينًا ..؟  أيكون  قد  وشى  به  أحد ..؟  مستحيل !

إن  كانوا  قد  اكتشفوه , أيتركهم  يقتلونه  هكذا  مثل أرنب , دون  أن  يتمكن  من  استعمال  سلاحه..؟

 

أزاح  الكيس  الرابض  فوق  صدره  كالهمّ , ونهض  واقفًا ..نظر  لكنه  لم  ير َ شيئًا .. لا  بد أن  الدورية  قد  واصلت  نحو  الشرق ..

حمل  الكيس , هذه  المرة  على  ظهره , ليتمكن  من  صعود  المرتقى .. لم  يصل  الحدود  إلا  وكانت  قواه  قد  خارت  تمامًا .. نظر  إلى  ساعته  فكان  العقرب  الكبير  يقف  على  الرقم 12  تمامًا .. هي  ساعة  الصفر  إذن..

ظهر  في  أقصى  عرض  الشارع  الحدودي  ثلاثة ٌ ملثمون .. عالجوا  جميعًا , هو من  ناحيته  وهم  من  جهتهم , الكيس  حتى  أنفذوه  من  الفرجه .. رفع  الرجال  سواعدهم  يحيـّونه  بصمت .. وبسرعة  حملوا  الكيس واسرعوا  يجتازون  الشارع  جنوبًا ..

 

قعد  على  الوحل  لفرط  فرحته , متجاهلا  الخطورة  والدوريه .. غمره  شعور  دافىء  من  الرضا .. كيف  لا ,  وقد  أدى  الامانة  على  أحسن   ما  يكون  الاداء ..

تحسس  رشاشه  ثم  انطلق  لا  يلوي على  شيء  باتجاه  الشمال ..

 

أشعل  سيجارة  وراح  يدخن  بشهية  كبيرة مسندًا  ظهره  إلى  باب  المغارة , ناظرًا  إلى  السماء.. كيف  نسي أن  الشهر  في  منتصفه ..!  كان  البدر  يظهر  تارة  ويختفي  أخرى  وراء  السحب ..

يا الله  كم  يشبه  وجهه  وجهها..

 

شعر  بأنه  محتاج  لإغفاءة  قصيرة , ولو  لساعتين .. !  ولكن, من أين يأتيه, بعد الذي مر عليه, النوم ؟! ..

 

لقد  كلفا  ليلة أمس  بمهمة  سرية , عسيرة  وحساسة  على  الحدود .. في  مرحلة  معينه  فتحت  عليهما  النار.. ثلاث  رصاصات  لا غيرها .. لم  يتمكنا  من  تحديد  مصدرها .. كان  من  الواضح  أنها   طلقات  عشوائيه .. يبدو أن  الجهة  الفاعله  قد  أحست  شيئًا  أو  سمعت  حركة , فاطلقت  النار  لتحدد  الهدف , من  خلال  رده ..

لم  يردا  على  النار , ولكن  زحفا  حتى  ولجا  المغارة .. هناك  فقط  أخبرته أن  إحدى  الرصاصات  قد  مزقت  أحشاءها .. اكتشف  أنها  قد  فقدت  كمية  كبيرة  من الدم .. حاول أن  يفعل  شيئًا , لكنها  بصوت  واهن  ضعيف قالت :

لا تفعل . لقد  قضي  الامر . أنا  ميتة  لا  محاله .. حاول  أن  تحقق  لي  حلمي  , ولو  ميته .. احفظ  الرقم  الذي  سأتلوه عليك .. هو رقم  أخي , في  الداخل .. اتصل  به  ولقنه  خطة  تسلمه  بها  جثتي .. أبلغه  أن  وصيتي  له  أن  يدفنني  في  الحاكورة , عند  شجيرة  السماق .. هو  سيعرف.

قالت  ذلك  واسلمت الروح .. ورأسها  على  صدره .. !

 

1_2

طلعت  الشمس  تتقافز  حلوة  فوق  الروابي  الشرقية , كالفراشة .. دافئة  مثل  عناق  العشاق.. كأنها  تقول  له : إبدأ  من  جديد.. كلنا  نبدأ  من  جديد ..

 

تحرك  شمالا  باتجاه  القرية  القريبة .. كان  يعرف  الكثيرين  من  أهلها ..

ولكن  لم  يكن  له  فيها  أهل ..

 

التي  كانت  ستكون  أهله , غادرت  ليلة  أمس , مجتازة ً الحدود  نحو  الجنوب , في  كيس …..

Advertisements

Read Full Post »

                                         ندم …

بقلم : عابر  سبيل

في  الناحية  الخارجية  للمنعطف , عند  إستدارة  الطريق  القديمة  نحو  اليمين , حيث  تضيق  جدًا  كعنق  زرافه ,  صخرتان  كبيرتان.. الشرقية  منهما  أقل  ارتفاعًا  من  أختها  ببضعة  أشبار , وتميل  نحوها , في  الأعلى , فتلتقي  قمّتاهما  في  عناق , لا  يعلم  كيف  بدأ  ولا  متى  ينتهي , إلا  الله..

بين  الصخرتين , وبفعل  المَيَلان , كهف  صغير , مثلث  الشكل .. في  داخله  حجران  متقابلان , للجلوس , وبينهما  شبه  دائرة , فيها  بقايا  عيدان  متفحمة ٍ  وآثار  رماد ..

هنا  روائح  بشرية  لرعاة  اعتادوا  اللجوء  إلى  المكان  وقت  الشتاء ..

في  الاسفل , مع  الانحدار  الشديد , واد ٍ  سحيق  تلتقي  في  مجراه  قواعد  عدة  جبال , مكسوة  كلها  بأشجار  حرجيه ;  بُطم  وخرّوب  وسنديان  وقندول  وسرّيس  وسوّيد  ورَنَد  وزعرور  وعَبَهَر  وغيرها..

في  وسط  الأحراج , في  الضفة  الأخرى  للوادي ,  قبالة  عين  الناظر  من  الغار , بلاطة  بيضاء  بمساحة  بيدر  كبير , شقت  طوليّا , أي  من  أعلى  إلى  أسفل , على  شكل  العين  البصرية  تمامًا .. تلك  هي عين  ماء  تتفجر    من  بلاطة  جرانيتية  صلبه , بخلاف  بقية  صخور  المنطقة  الجيرية , ملساء  كبيضة  مسلوقة  بعد  تقشيرها ..

على البلاطة , إلى  يمين  الدرجات  الحجرية  الهابطه  داخل  العين , بقع  صغيرة  وخطوط  متشابكه , داخل  الصخر , لونها  بين الأحمر  والبني ّ.. كانت  عجائز  القرية , اللواتي  انقرضن  فلم  تبق  منهن  اليوم  واحده , يحدثن  أن  تلك  البقع  والخطوط  هي  دماء  رجل  مر  في  الليل على العين , ونزل  ليشرب  او  ليسقي  جواده , فخرج  عليه  من  العين  جـنـّي اغتاله , لانه –  هكذا قلن –  مس الماء  ليلا  من  غير  أن  يُسمّي .. بعدها  مسح  الجـنـّي  كفيه  الملطختين  بالدم ,  بتلك  المنطقة  من  البلاطة , كما  لتكون  عبرة ..!

اجتاز  الزاوية  حيث  تجلس  بعض  نسوة  الحي .. حيّاهنّ  بأن  رفع  لهنّ  كفه  من  غير  أن  يلتفت  ناحيتهنّ , ومضى  إلى  حيث  يجلس  الرجال ..

هذا  الرجل – همست لقلبها –  الذي  تأبى  ابتسامته  أن  تفارق  مخيلتها , لا  يتخلى عن  أناقته  ومشيته  الواثقة  حتى  في  المآتم..!

كان الصمت  سيد  الموقف .. أمّا  هي  فلم  ترفع  عنه  عينيها  إلا  بمقدار  ما يمنع  الريبة..

يا الله .. لم  يتغير  فيه  شيء  سوى  بعض  شيب  غزا  رأسه , زاده  جاذبية ..

لماذا  تلح  عليها  الذكريات  الآن  الآن أكثر  من  أي  وقت  مضى ؟!

عمومًا –  طمأنت  نفسها –  صمت  الناس  من  حولها  لا  يعني  بالضرورة  استغراقهم  في  الحزن .. بل  لو  أن  أهل  الميت عرفوا  ماذا  بالضبط   يدور في  رأس  كل  واحد  من  المعزّين , لطردوهم ..!

ثم  أليس  الحب  أقوى  من  الحياة  والموت على  حد  سواء ..؟!

هي  صارت , في  السنوات  الاخيرة , وبعد  انقطاع  لسنين  طويلة  جدًا , تراه  كثيرًا ..  بل  إنها  تستطيع  أن  تراه  كلما  ارادت  تقريبًا ..  ولكن  ما  الفائدة  ما  دامت  لا  تملك  ان  تخلو  به , وما  دام  هو  يملك  تلك  القدرة  المستفزّة  على  التغافل , وتجاهلها ..!

أيعاقبها ..؟   أم  أنه  بالفعل  نسيها  تمامًا ..؟  اوَلم  يمض ِ  من  السنين  ما  غيّر  وجه  العالم ..؟

إذن  لماذا  لم  تنس هي  أيضًا ..؟  أحقًا  بفعل  الحب , أم  ربما  بسبب  تأنيب  الضمير ..؟ أو أن  أنانيتها , بعد أن  تكشفت  أمامها  فداحة  خسارتها , هي  كل ما  في  الامر ..؟

لا  تستطيع  اليوم  أن  تحصي  عدد  المرات  التي  فيها  تعانقا   في  الغار ,  بُعيد  المغيب  ومع  طلوع القمر .. ولا  كم  مرة  وقفا  ببابه  تتشابك  أكفهما  يحدقان  في  العين , هناك  في  الاسفل , كما  ليستقرئا  في مائها  مصيرهما .. لكنها  تذكر  جيدًا  أنه  وقت  كان  يحتضن  كفيها   براحتيه , كانت  تشعر  بالدوخة  وخدر  في  عضلات  جسدها .. يخفق  قلبها  الصغير  بقوة ,  حتى  لتكاد  تنشق  عنه  ضلوعها .. وفي  آخر  كل  لقاء  تتسلل  عائدة  دون  أن  يحس  بها  أحد..

اليوم  تعرف  أنها  كما  ما  أحبت  قبله , فإنها  لن  تحب  بعده , ولو طال  بها  العمر  مليون عام .. لانها  ببساطة , وبعد   مرور  سنين   طويلة على  آخر  لقاء  بينهما , ذاك  اللقاء  المشؤوم  الذي  فيه  قالت  كلمة  كانت  السبب في  رحيله , حتى  تمنت  بعدها  لو أنها  ماتت  قبل  أن  تقولها , لم  تصادف  رجلا  مثله , ولا  حتى  يشبهه..!

هذا  هو  السر  في  أنها   إلى  اليوم   تشعر , كلما  رأته , بذات  الخدر  في  جسدها , وذلك  الخفقان  السريع  في  صدرها ..

ترى  كم  امرأة  عرف  بعدها ..؟  من  أين  بالضبط ..؟  أجميلات ..؟  وكيف  انتهت  حكاية  كل  منهن  معه ..؟

أم  ان  حكايتها  هي  الوحيدة  التي  انتهت ..؟

ولكن  لماذا  تريد  ان  تعرف..؟

ليته  يضرب  لها  موعدّا , كما  في  القديم ..

ليته  يعاتبها .. أو  يشتمها ..

كم مرة ٍ  تمنت  لو يرن  جوالها  ويكون  هو على  الطرف  الآخر..!

لكنه  لا  يفعل .. يمر  دائمًا  بقربها  كأنه  لا  يراها..!

 

normal_alamuae-gallrey218_y1y1

Read Full Post »

السّراب

بقلم: عابر سبيل

تراكم البخار على زجاج النافذة, فأضر بالرؤية.. تذكر مصيره المجهول وغموض غده..

كان الجو صحوًا طيلة النهار.. لم تبدُ في الفضاء أي شارة أو بشارة تنذر بالمطر.. فجأة تصدعت السماء بماء منهمر.. كأنها ملايين القِرَب اندلقت معًا.. مر في ذهنه ذلك النوع من النساء.. تكون الواحدة منهن في الأشهر الأخيرة لحملها,دون أن يكتشف الناظر, للوهلة الأولى على الأقل, أنها حامل أصلا..! أكانت السماء تبكي عليه, أم نيابة عنه..؟

شق النافذة قليلا.. كانت حبال المطر نازلة من السماء نظيفة رقراقة .. كأسلاك فضيّه .. تصفق الإسفلت بقوة.. تمامًا كما ارتطم هو بواقعه .. ثم سرعان ما يتحول لونها إلى البني , بسبب الأوساخ وقاذورات الشوارع..
ما أكثر الأشياء التي كانت في الأصل جميلة ونظيفة.. لكننا دنسناها بحماقاتنا, أو لفرط كبرياء زائفة فينا..!
جاءه سعال ضعيف مخنوق من الداخل.. أسرع نحو أبيه الراقد في سريره.. كومة من العظام .. رفع البطانية على جسد الشيخ .. وقع نظره على عينيه الغائرتين, فتمنى لو أنه
كان يستطيع إعادة الزمن إلى الوراء وترتيب الأشياء من جديد..
ماتت أمه قبل أن يتم الرابعة.. بعدها تزوج أبوه من أخرى ..عرف يومها أن اليتيم ليس من مات أبوه .. وحده من ماتت أمه  يتيم ..

مع السنين وجد عزاءه في حبه الأول .. فاطمة وحيدة الشيخ محمود..

ايه   يا   فاطمة ..
اقتحمت حياته بسهولة متناهية, لافتقاره وقتها لأي مناعة عاطفية .. لفلفته بمشاعر نقية غامره .. تمامًا كما يليق بعشق صبايا الريف اللواتي لم تشوّه الحضارة صدق مشاعرهن ..!
إلى  أن  كان  يوم ..
حادثها على النت, ربما لشهرين .. فتن بشعرها الأصفر وعينيها الخضراوين .. دعته إلى بلادها بعد أن وعدته بحب وفير ورزق أوفر.. اعتقد أن طاقة القدر قد فتحت له, للهروب من حياة  ليس مثلها إلا الموت..
توسل إليه أبوه ألا يسافر .. قال له أن كرم اللوز كبير, وان سنه وأمراضه لم تعد تسمح له بالعناية به.. ولكن ما تصوره فرصة العمر, حال بينه  وبين الإصغاء إلى أحد..
وسافر.. دون أن يخبر فاطمة..

373461_l

عاش مع ‘ فيرا’ ثلاث سنين .. زاول خلالها أعمالا كثيرة.. دنيئة وغير مربحه.. إلى أن كانت ليلة ضبطها, متلبسة, مع آخر.. وما إن احتج , حتى طردته من بيت أمها, الذي كانا يقيمان معها فيه..!
في الشارع .. مع القطط الضالة والمتسولين .. وجد نفسه يردد :

أين هذه الساقطة من فاطمة ؟ ..

تذكر وقت أوصاه أبوه ألا يسعى أبدًا للجلوس فوق القمم التي يسهل السقوط منها..
طرق الباب, حال وصوله في الصباح الباكر, فلم يفتح له أحد.. دفعه بقوة ودخل .. كان في البيت سكون رهيب .. جال في الغرف فخيل إليه أنه في مقبرة .. وصل أخيرًا حجرة نوم والديه, فوجد شبح أبيه في السرير .. لولا انه أبوه لما تعرف عليه, لفرط ما فعل الزمان به في سنين قلائل..
أخبره الشيخ أن أخته قد تزوجت وسافرت مع زوجها إلى كندا.. لم يعرفوا عنوانه وقتها كي يخبروه..
قال أيضًا  إن اليهود  قد  جرّفوا  أكثر من ثلثي أشجار اللوز.. بقيت بضع شجرات لم يتمكن , بسبب مرضه, من جمع ثمارها, فتركها للرعاة  والعصافير..
انتظره كي يقول شيئًا عن فاطمة, إلا أن الشيخ عاد إلى صمته.. خجل أن يسأله .. تركه وراح يدخن عند النافذة.. محطمًا.. يائسًا.. موقنًا أنه قد خسر كل شيء.. كل شيء ..

في حوالي السابعة, سمع طرقًا قويًا على الباب.. حين فتحه, اندفعت إلى الداخل هاربة من المطر .. ومن عيون الآخرين ..
وقفت أمامه تجلل رأسها كبرياء الخاسرين .. كانت خصلات شعرها المبللة قد أضفت على وجهها سحرًا ملائكيًا, جعلها تبدو أجمل نساء الدنيا.. فهم حينها أن للحب قدرة أسطورية لإضفاء الجمالية حتى على الأشياء أو الأشخاص العاديين ..
تظاهرت أنها فوجئت بوجوده.. قالت : ‘ أنت هنا ..؟ جئت أتفقد الشيخ..’  واستدارت لتمضي ..
وجدت أقدامها ثقيلة كما لو كبلت بقيد .. تمنت لو يستبقيها أحد أو شيء, ولو كان الموت.. كانت ما تزال تحبه كما لم تحب امرأة رجلا.. تحس كأنها ولدت منذ الأزل لتحبه هو.. كأنه “مفصل على قدها”.. كما لو أنها لا تصلح, أو لا يصح أن تكون لغيره.. لكنها بكبرياء الأنثى تعرف أن المرأة قد تضحي بكل شيء لأجل رجل تحبه, لكنها قد تضحي به نفسه, لقضية تتعلق بكرامتها.. وكانت فعلته تقف بينهما كنهر من نار..
لا يعرف من أين جاءته الجرأة ليقفز بينها وبين الباب.. وقف هناك كالصنم.. حاول أن يعتذر .. أن يقول شيئًا .. ولكن هربت من على شفتيه كل الكلمات..
تمنى لو أنه يستطيع الانحناء لتقبيل قدميها.. أمّا هي فلم تكن محتاجة لكل هذا, لتغفر .. كانت تنتظر فقط بضع كلمات تساعدها لتحييد ضغط هائل تمارسه عليها كرامتها.. ولكن أنّى لمثله أن يفهم.. هو لم يكن من ذلك النوع من الرجال القادرين على إدراك عمق الإيقاع  السري لعواطف أنثى ..
في هذه اللحظات الحادة الحرجة, جاءهما سعال الشيخ من الداخل .. ركضا نحوه معًا ..

كان واضحًا أنه في الرمق الأخير..
لما رآها قال : ‘سامحيه يا ابنتي.. لم يبق له إلا أنت.. ‘ واسلم الروح..
وجدت في كلمات الشيخ ذريعة وجيهة  لتبرير فضح مشاعرها.. فانفجرت  في  بكاء  يقطع  نياط القلوب..
عند رأس الشيخ تعانقا ..

انتحب بين يديها كما يليق بطفل/ رجل يتيم ..


بعد  شهرين  تمامًا  كانت الزغاريد  ملء  فضاء  المخيم ..

كانت  ليلة  زفاف  حسن  وفاطمة.

 

Read Full Post »

^ الـلـص .. !

بقلم : عابر  سبيل

تحت شجرة التوت, على المسطبة أمام دار المختار, كان الرجال يحبسون أنفاسهم, بين الحيرة والحيرة, مشدوهين لتلك التفاصيل الساخنة, التي راح الشيخ بركات يدلي بها, بلهجة تتعمد الإثارة..

تململ فوق كرسي القش الذي ضاق بجسمه الضخم نوعًا ما.. أسند رأسه للوراء, ليتمكن من دس سبحته في جيب قمبازه, كما ليضفي على الموقف الجديّة التي تليق به, ثم, بذات اللهجة, أكد أنه رآه ليلة أمس رأي العين..

قال إنه تأخر في الجامع لأكثر من ساعة بعد صلاة العشاء, لبعض شأنه.. بعدها مشى قاصدًا بيته, عبر الزقاق الضيق, ذي الارضية المرصوفة ببلاطات قديمه..

في المنعطف المظلم, تمامًا بعد أن اجتاز دكان خالد النابلسي, رآه.. عند أول ساحة العين..

كان يرتدي معطفًا أسود طويلا, ويخفي رأسه تحت خرقة, لم يتمكن الشيخ من تحديد لونها بالضبط, ويمشي الهوينا, على ضوء القمر, بثقة عجيبة, دون أن يلتفت.. خالط  روع الشيخ بركات ذلك الرعب الذي يعهده من نفسه, حتى في مواقف أخف وطأة من هذا.. مع ذلك لملم شتات بقية شجاعة لا يخلو منها حتى جبان, ومشى خلفه متخفيًا, يرقبه من بعيد, إلى أن رآه يجتاز الساحه ويهبط غربًا باتجاه البحر..

قفز يوسف المصري من على كرسيه, كمن لدغته عقرب.. ضرب الارض بقدميه, يكاد يتميز من الغيظ.. لو أن الراوي كان غير الشيخ بركات, لصب فوق رأسه حمم غضبه.. وبلهجة تحمل الكثير من الأسف ومحاولة ضبط النفس قال :

الله يسامحك يا الشيخ.. كيف تركته يفلت..؟  ثم كيف لم تر كيس القمح معه..؟ ترى أين أخفاه ..؟ لا بد أن له شركاء..

الطرق إليها متعرجة وغاية في الخطوره.. تتلوى بين أشجار الاحراج والقمم الصخريه, كأفعى أسطوريه.. أما الداخل اليها, فسرعان ما ينسى ما لقي من تعب او نصب, لأنه يشعر كما لو كان قد غادر للتو حدود الحضارة, ليلج مملكة الانسانيه..!  بيوتها الحجرية القديمة, ذات الشبابيك الخشبيه المستطيلة, المطلية بألوان زاهيه, تبدو مرصوعة رصعًا بين الصخور والتضاريس الجبليه.. حواكير مقسومة عرضيًا بسلاسل حجرية غاية في التنظيم والتنضيد, مزروعة كلها باشجار الفاكهة; لوز وخوخ وتفاح واعناب, وحتى الكرز.. أحواض ورد ندية نضرة تزين مداخل البيوت ; حبق وريحان.. وياسمين وأقحوان وأخرى.. هواء نقي خفيف مضمّخ بروائح عطرية كأنها تجيء من ناحية الجنة..

كل شيء بسيط ومتواضع هنا في أم عوينات اوالمنطره, كما يسميها سكان قرى المروج الممتدة جنوبًا.. البيوت.. الناس.. بل وحتى الاحلام والطموحات.. صحيح أنها تتربع على قمة شاهقة لأحد الجبال التي على الحدود, لكنها كانت دائمًا آمنة ومسالمه.. الناس فيها ينامون وأبواب بيوتهم مفتوحه.. ويوسف المصري لم يكن يبيت على بيدره لحراسة المحصول من الآدميين.. ولكن من البهائم..

من أين إذن انحط عليهم هذا اللصوص..؟ كيف تمكنوا, خلال اسبوع واحد, من استغلال غفوات قصيرة ليوسف المصري على طرف بيدره, كي يتسللوا فيسحبوا كل ليلة كيس قمح , دون ان يفطن لهم ..؟

في الأيام التالي تلت تناقل الأهالي أخبارًا مفادها أن مجموعة من اللصوص تهاجم البيوت والممتلكات..

أقسم أحد الرعاة أن الشيخ بركات قد التقى اللصوص وجهًا لوجه عند باب الجامع.. أمّا أم البنات فقد حلفت لكل من أراد أن يسمع, أن يوسف المصري قد اشتبك معهم في الناحية الشرقيه.. وأن بعضهم كان مسلحًا بالبنادق, فيما حمل آخرون سيوفًا قواطع..!

شعر المختار, كونه المسؤول الاول عن الأمن العامّ, بقلق شديد إزاء ما تناقله الناس.. خشي أن يتهمه المواطنون صراحة بالعجز أو التقاعس, فقرر القيام بإجراء يقنع السكان أنه ما زال, رغم كبر سنه, أهلا لمنصبه..

دعي الناس لاجتماع عاجل في ديوان المختار.. هناك أبلغهم أبو الأمينقراره تشكيل فرق حراسة ليلية من شبان القريه.. مع تنبيه الحراس أن عليهم, لو صادفوا اللصوص, الحضور فورًا لابلاغه, ويقوم هو بإبلاغ الناس, ليخرج الاهالي ويمسكوا باللصوص, فيسلمهم للسلطات.. هكذا يثبت الجرم بتواتر الشهود, كما قال..

ليلة الجمعه هرع الحراس, يكاد يصدم بعضهم بعضًا, نحو دار المختار, ليخبروه انهم تركوا لصا عند طرف ساحة العين, يمشي غربًا باتجاه المقابر.. قالوا إنه كان بإمكانهم القاء القبض عليه بسهوله, لانه كان يمشي بطيئًا كما لو أنه في البلدة وحده.. إلا أنهم لم يفعلوا انصياعًا لتعليمات المختار..

خلال بضع دقائق كانت أم عوينات عن بكرة أبيها, تحمل مشاعل أنارت قمة الجبل, وتحث الخطى نحو الغرب.. اجتازوا ساحة العين.. هبطوا غربًا حتى اصطدموا بالسياج الشرقي للمقبره.. هناك وقفوا, ليقترح المختار أن يقسموا أنفسهم فريقين, فريق يمشط المنطقه  شمال المقبره, وآخر يمشطها من الجنوب.. أعجب الناس بحنكة مختارهم, وسددوا رأيه,  ولكنهم ما أن عزموا على التنفيذ حتى فوجئوا  بأحدهم يصيح : أنظروا.. إنه هناك.. على القبر..

صعق الجمع.. تسمروا في أماكنهم.. رأوه يجلس في الظل,عند رأس القبر القريب من جذع شجرة الخروب, وظهره اليهم.. كان فعلا متلفعًا بالسواد.. لم يتحرك.. رغم الجلبة والاضواء.. كأنه لا يكترث لهم.. بينما لم يجرؤ أحد على الاقتراب منه, حتى يوسف المصري.. أما الشيخ بركات فكان يتمتم بأشياء لم يفهم الناس منها إلا جزمه أن هذا الجالس على القبر جني بكل تأكيد..

فجأة قام .. مشى خارجًا من القبور.. فسح له الناس الطريق, رعبًا لا تكريمًا, ولما توسطهم أماط الخرقة عن رأسه ..

كانت أرملة المرحومسليم الغزاوي, الذي لقي مصرعه في حادث عمل مروع , قبل حوالي شهرين.. تأتي كل ليلة جمعة لتتوحد مع حزنها عند قبره..

في هذه الاثناء بالضبط.. كان علوان الاعرج, رجل سر المختار وساعده الايمن, بعد أن أنهى مهمته, يحكم إغلاق البوابة الرئيسية لمخازن المختار, في الناحية الشرقيه من ام عوينات…..

Read Full Post »

  لعبة  الحب .. والموت  

بقلم : عابر سبيل

 

 

أخيرًا عاد..

حلو وجهه كوعد حبيب .. تفتح اللوز على ثغره ابتسامة ً مثل  فلقة  القمر ..

أساريره هادئة مطمئنة, كقلب عابد ..

آه .. كم انتظرته ..

كانتإذاحلالمساءتفكضفائرها .. تخرج  صابونتها الجديدة المعطرة وتأخذ حمامًا ساخنًا ..

تمرر الصابونة على كل مسامات جسدها البض .. وتراه يطل عليها من مكان ما , مثل ملاك ,

فتبتسم , وتعلو وجنتيها حمرة الخجل .. تجلس بعدها  ساعات أمام مرآتها , تسرّح شعرها

الطويل الناعم , بمتعة  وعناية .. كي تنشره على كتفيها المدوّرتين , شرشفًا من  ياسمين .. ينتظر وجهه.. وترهف السمع ..
كم مرة قفز قلبها وركضت نحو الباب .. لتنكسر على أعتابه روحها , عندما تكتشف أن ما ظنته نقرًا على بابها , لم يكن في الواقع , غير ريح أواسط الخريف .. صفقت نافذةً  أو جرّت كرتونة عتيقة على الإسفلت..
وعادت , في كل مرة ,  تتجرع الخيبة , كي تندس في سريرها , الذي تحول منذ زمن إلى قطعة من جليد ..
تسحب صورته من تحت وسادتها .. تقبلها .. تعاتب طيفه .. وتبكي بحرقة .. كمن مات أهل الكون كلهم , ليتركوه على كوكب الأرض وحده ..
ما أصعب أن يعيش عاشق على صور ..!
تتذكر الليلة الوحيدة التي لفحت فيها أنفاسه صدرها .. ليلةً انتظراها جميعًا منذ كانا طالبين في الثانوية..
انحدر من الجبال ملثمًا .. تزوجا .. وقبل طلوع فجر اليوم الثالث, عند الباب , ضمها .. وغادر ..
بكت وقتها مثل طفل ينزعون منه أمه .. لكنه وعدها أن سيغيب  ثلاثة  أيام  ويرجع ..
وصدّقت ..
ها قد مرت ثلاثة شهور .. كأنها ثلاثة قرون .. جربت خلالها كيف يصير الانتظار زمنًا آخر يتحالف , مجانًا , مع  الزمن  العادي , لقضم العمر ..
كم استحضرت في ذهنها لحظة اللقاء ..
رسمتتفاصيلهابدقة .. ثمعادتوغيّرتفيهاألفمرة ..

مشهد واحد ظل عالقًا في مخيلتها , لم تُجْر ِ عليه أي تعديل ..

كانت  قررت أنها ستأخذ راحته , لحظة يطرق بابها , لتضعها برفق على بطنها , كي يتحسس بنفسه ابنه الذي كان هناك ..
أخيرًا عاد ..
حلو وجهه كوعد حبيب ..

تفتح اللوز على ثغره ابتسامة ً مثل فلقة القمر ..

أساريره هادئة  مطمئنة , كقلب عابد ..
ولكن سترته كانت  مخرّمة ..  ومصبوغة كلها بالدماء ..
عاد محمولاً على أكتاف ثلاثة من رفاقه .. أسلموه لها ..  قبلوا جبينه .. وعادوا مسرعين باتجاه الجبال ..
فيتلكالليلةترددفي الهضاب المحيطة بالمخيم دويٌمخيفلزخاتمتواصلةمنالرصاص ..
لا بد أن  رفاقه  ثأروا له ..

لكن  هي ..

من  يثأر  لها ..؟!

66616

 

Read Full Post »

!  موت  في  تل  أبيب  !

بقلم : عابر سبيل

عندما ينتحب القلب, تنوح عليه أو بسببه, أعضاء الجسد كافــّـه.. تذبل العينان .. والوجه ينحسر عن جلده الدم .. تضعف عضلات العنق .. والمعدة تفقد كل شهيتها.. ها هو رأسها الصغير ثقيل ثقل الهم.. وعيناها ينز منهما ماء الدمع, رغم اشتعال محجريهما سهرًا وحزنًا.. تنظر أسفل منها, فترى مرجًا شاسعًا من النجوم.. أضواء بنايات المدينة وسياراتها تمتد ملء المدى.. بعضها قريب وساطع كأنه يتحدى.. وبعضها قد أصابه اصفرار الشحوب, كأنه يفنى.. بعضها ثابت.. وبعضها يجري قليلا ثم يختفي كأنه شهاب تهاوى..
من يعرفها هنا..؟ من يشعر بوجودها..؟ من يفهم لغتها..؟ من يأبه لها..؟ وحده البحر.. كانت تمشي بأحلامها فوقه كل ليلة, حتى تصل بيتها, على شاطئ البحر ذاته, في مدينتها التي كانت, وقت تركتها, تغرق في حصار الظلام.. أليس مفارقة أن يتمنى المرء أحيانا لو يلفظه الضوء إلى جوف الظلمة..؟

لم يسمحوا لزوجها بمرافقة ولدهما ابن الثامنة لتلقي العلاج هنا.. أوقفوه عند المعبر .. قالوا له بفظاظة : ‘أنت , إلى هنا’..
عانقت أطفالها الثلاثة الآخرين, الذين تعلقوا بذيل فستانها.. وبكت.. بعدها ودعت زوجها, وبأطراف أناملها مسحت دمعتين جالتا في زوايا عينيه.. وجاءت..

ifo07593

على مدى سبعة أيام متواصلة حاول أطباء مشفى “ايخيلوف” الشاهق البناء والكفاءة, في تل أبيب, إنقاذ حياته, لكن دون جدوى.. كانت أحشاؤه قد تهتكت كليًا بفعل الإصابة..
مات رجاء” قالت لزوجها عبر الهاتف, وسقطت السماعة من يدها, لتجهش في بكاء صامت, مثل حرة عربية تم المساس بكرامتها..
كيف فاجأها الموت هكذا.. وحيدة.. بعيدة.. غريبة.. وبائسة..؟

قبل ولوجه الباب الرئيسي للمشفى, حوالي التاسعة صباحًا, صحبة زوجته وولدهما , لإجراء فحص معين للولد, لمحها هناك.. على المقعد الحجري وحدها..
بعد ساعتين, وقت خرجوا من نفس الباب, كانت ما تزال متحجرة على نفس المقعد.. عاطلة عن الأمل..
توقف.. كرر النظر.. كان هندامها وذكاؤه كافيين ليجزم أنها من هناك.. هاتف غريب شهق في أعماقه أنها تتستر على مصيبة..
أومأ لزوجته وابنه فيمموا كلهم صوبها.. عندما صار في مواجهتها تمامًا تأكدت ظنونه ..
كانت في أواسط الثلاثينات.. وكان في عينيها أسى مثل أسى الذي يحمل في قلبه كل أحزان البشرية.. نظراتها منهكة كأنها فقدت أي وقت للحياة.. عندما تكلمت كان لصوتها نبرة من تتوسل القدر لكنس شوارع أحزانها.. تلك الأحزان اللحوحة كهاتف يرن ولا يرفعه أحد..
قالت إن ولدها يرقد في ثلاجة الموتى منذ ثلاثة أيام.. لان السلطات هنا ترفض نقله, بحجة أن السلطات التي هناك, من الجهة الأخرى للمعبر, لم تقم بالترتيبات والتعهدات المناسبة .. تتوسل حارس بهو الأموات لتلقي على الجثة نظرتين أو ثلاثا كل نهار.. امّا في الليل فتقف لساعات على شرفة الطبقة الثانية عشرة للمشفى.. كأنها على أرجوحة معلقة في السماء.. لا لتبكي .. فهي قد غدت في حالة تحسد فيها من يستطيعون البكاء.. بل لتنتظر, مصغية لهدير ذلك المخلوق المتمدد بكسل حتى بيتها .. وحده البحر كان قادرًا على التعاطف مع تشرد وجدانها..

1780
لم يفكر كثيرا.. هو كان يؤمن أن إعمال  العقل قد يحرم الرجل, في بعض المواقف, متعة أن يكون رجلا .. بل ويعرف أن أكثر المواقف نبلا في حياته كلها كانت تلك التي تبنّاها دون إجراء الموازنات العقليه..
طلب من زوجته اصطحاب ابنهما وانتظاره في المرآب حيث السيارة, فيما اصطحبها إلى الداخل .. ساعدته مواطنته , تجربته ولغته , على إتمام إجراءات تسريح الجثمان بسرعة .. أخذ الأوراق وطار نحو ثلاجة الموتى, وهي في أثره, لا تكاد تلحقه.. طلب منها أن تشير له نحو الجارور حيث الجثة .. سحب الجارور برفق .. أشار إليها لتلقي على وجهه نظرة, لتفادي أي خطأ قد يقع.. اتصل بزوجته طالبًا منها إدخال ولده إلى السيارة كي لا يراه حين يصل.. وأن تحاول التخلص مما في الصندوق الخلفي للسيارة من خلال إلقائه في أقرب صندوق للقمامة.. رفع الجثمان بين ذراعيه ومشى .. مدده في الصندوق .. ولما ركبوا جميعًا, قالت له زوجته, التي لا تكاد تصدق ما ترى:’ إلى أين ‘؟  قال : ‘إلى غزه’..
لم تناقشه, لأنها كانت تعرف انه مهيأ ليفعل ما هو أكثر جنونًا, أو شهامة, ولكنها اقترحت: ‘ بل أوصلني والولد إلى محطة القطارات.. نسافر إلى البيت وحدنا .. لا تخف علينا..’.
انطلق بسيارته جهة الجنوب.. تجلس خلفه امرأة نصف ميتة.. ووراءها يرقد طفلها الميت ..
حوالي الرابعة عصرًا كانا على المعبر.. لكنهم كانوا قد أغلقوه, بحيث لا يسمحون لأحد, ولو لجثمان, بالدخول أو بالخروج.. أجرى عشرات المكالمات الهاتفية .. أشرك في الموضوع نواب برلمان وشخصيات أخرى..
في السادسة والنصف تمامًا, كان ‘رجاء’ ممددًا في صندوق سيارة أجره.. وراء الحاجز الحدودي.. وكانت هي تقف إلى جانب السيارة..
مشت إلى الوراء, باتجاهه,  بضع خطوات.. قالت , من وراء  الحاجز : ‘ما اسمك ‘؟ أجاب : ‘ وماذا يهم ؟ ‘.. تمتمت بشيء لم يسمعه جيدًا.. ولن يعرفه إلى الأبد .. رفعت كفها الصغيره تودعه.. رآها لأول مرة تبتسم .. كمن أحست أخيرًا بالطمأنينة.. تماسك إلى أن بدأت سيارته تنهب الأرض باتجاه الشمال.. وأجهش يبكي..

Read Full Post »

بنات   وأمّهات

بقلم : عابر سبيل

… ” يمّا لا تتأخري.. الساعه عشره.. لا تنسي التبّوله.. كل الأمهات جايات..”

أشرقت الطفولة على وجهها كالبراءه.. ألقت أوامرها, كما هو طبع أولاد هذا الزمان, ومشت بقفزات صغيرة, مثل جندب .. على جانبي رأسها خصلتا شعر مربوطتان بعناية, مثل قرنين صغيرين .. وليس على ظهرها تلك الشنطة التي طالما حملت خلال أيام العام زوادتها .. فاليوم آخر ايام السنة الدراسية, ومعلمة الروضة نظمت بهذه المناسبة, احتفالا متواضعًا, دعت اليه الامهات..

تبعتها أمها حتى سلم الحافله .. ربتت على كتفيها بحنان بالغ, واعتذرت بشبه تذمر, لأن عليها العودة بسرعة لتجهيز بقيه الاولاد لمدارسهم ..

من هناك .. خلف النافذة الموغلة في الكآبه .. تمنت لو تطلق العنان لصرخة مكتومه : أمهمومة انت ِ بالاولاد ..؟ خذي نصف الذي ظل من عمري وأسعفيني بهَم ٍ مماثل.!

منذ ثلاث سنين, او أقل قليلا, تحرص على الجلوس عند ذات النافذة, ساعة انطلاق اطفال الحي الى مدارسهم .. تحدق فيهم وقت يجيئون مع الصبح, من جميع الجهات, لتجمعهم الساحة القريبة, كالجداول حين تتعانق عند النهر, ينتظرون السيارة التي تقلهم إلى المدرسه .. تسمع ضجيجهم الصباحي .. تراهم يلعبون ويتمازحون .. وأكثر من مرة, في أيام مضت, ركضت نحوهم كي تفض اشتباكًا اندلع بين بعضهم, دونما سبب واضح ..!

تعرفهم كلهم .. ومن خلال هيئاتهم .. ترتيب ثيابهم وتسريح شعورهم, صارت تعرف أمهاتهم أيضا .. !

في بعض الأحايين كان خيالها, لحظة صفاء, أو جنون, يجنح بها لتتخيلهم كلهم ابناءها.. كالصائم يشتهي كل شيء , مع أن القليل يكفيه ..

وقت تزوجت, يوم كانت في الثامنة عشر, توقعت أن تصير أمّـًا خلال السنة الأولى للزواج .. هذا ما حدث فعلا لصديقاتها اللواتي تزوجن في نفس الفتره.. حملن.. وانجبن .. وصار لبعضهن أبناء أمسوا اليوم على عتبات الرجولة الاولى ..

إلا هي ..

مضى على زواجها اليوم تسعة عشر عامًا.. مع ذلك, ظلت رحمها, طيلة سنين, صحراء مجدبة, لم ينبت فيها حتى الشوك, كأرض سبخة ..

ترددت وزوجها على الأطباء والعيادات, القريبة والبعيده .. على الفتّاحين وقارئات الحظ .. انفقا في سبيل ذلك أموالا طائله .. لكن دون طائل ..

ظلت نظرات جاراتها, على مدى الايام, تعيّرها بكل لغات العالم .. سياطـًا تجلد, كل يوم, كبرياءها ..

أولئك النسوة .. كأنهن خلقن بلا قلوب .. يبتسمن لها إن قابلنها , كما لو أنها لهن أخت شقيقه .. ومن وراء ظهرها, يتهامسن عليها وعنها , على أشد ما يكون التشفي .. يستمرئن إمعان التحديق في عمق جرحها المعروض للفرجة.. ويغرسن في كرامتها ألسنة, ليست من عظام ولكنها قادرة على كسر أي عظم..

كانت هي تدرك أن هذا هو حال الناس .. إن واجهتهم بشّوا لك .. وربما تملقوك .. وإن استدبرتهم ولغوا في عرضك .. وربما اغتالوك .. مع ذلك, هي لا تنكر أن في أعماقها شعورًا ملتهبًا من الغيرة, ما خبت ناره يومًا إلا كي تعود لتضطرم من جديد ..

من يعي مأساة فتاة لم تصبح زوجة ..؟

من يفهم فاجعة زوجــة لم تصبح أمًـا..؟

من يدرك بلوى امرأة تتآمر عليها , بالصمت الصارخ , كل الجارات ..؟

رحمها أرض خصبة .. هي تعرف ذلك , والاطباء كلهم أكدوا هذه الحقيقة .. فلمَ إذن تحرم بذرة صالحه..؟

توالت عليها الايام والسنون رتيبة ممله .. صار نهار الناس ليلا عندها .. وليلها كالنهار .. تعطل في عمرها الامل .. وفقدت أي رغبة في أي شيء .. أصيب قلبها بالتصحر العاطفي .. وتغلغل الفتور , إن لم يكن أكثر , في علاقتها بزوجها .. صار كل منهما يجتنب ان ينفرد به الآخر .. كأنما يخافان انفجار مواجهة يتحرق رمادها في الأعماق منذ زمن ..

يقضي هو أغلب أوقاته في الخارج .. أمّا هي فلم تعد تشعر به إن دخل او خرج .. انكفأت على نفسها .. تمضغ أحزانها .. وتجتر حسرتها .. وحيدة , رغم كثرة الذين من حولها , سوى من بطنها .. وحده الذي كانت تحس تجاهه بشفقة عارمة .. تتحسسه في الليل وتبكي .. تعتذر له عمّا لا ذنب لها فيه ولا حيلة ..!

ذات صباح من أوائل نيسان .. كانت السماء تواصل ري الارض بأمطار غزيرة لم تتوقف طيلة الليل, على غير عادة الطقس في مثل تلك الفتره .. قررت زيارة الطبيب في العيادة القريبة .. لأنها وقت قامت من نومها, شعرت بدوار وشيء من غثيان.. هناك , قال الطبيب , بعد فحص عادي أجراه لها, أنها ببساطة شديدة .. حامل…!!

وتغير وجه الحياة .. وغير التاريخ مساره ...

كبرتأملمحوطة برعاية قلما توفرت لطفل .. كانت العائلة كلها ; الابوان , الأجداد , الاعمام .. بل والمعارف والاصدقاء , كل يتفنن في مداعبتها وتدليلها .. ويتسابقون لتلبية طلباتها ..

89018434pb41

الى أن كان يوم ..

ذات أول ايلول .. اليوم الذي كانت فيه قدماها الصغيرتان ستطأان لأول مرة أرض الروضه .. انسلّتأمل‘, ابنة الرابعه, خارج المنزل, باكرًا من فرط فرحتها .. وهناك .. بقرب عمود الكهرباء, في الساحة نفسها , جلست على الارض تحكم إقفال شنطة زوادتها .. وصلت الحافله التي ستقلها وبقية الاطفال .. لم ينتبه السائق لوجودها .. سافر بسيارته الكبيره الى الوراء .. فمسحت عجلتها الجسد الصغير بالاسفلت …….

علا الصراخ من البيوت .. اجتمع الناس .. انتحب الرجال قبل النساء .. أمّاأمل‘, فكان على وجهها البريء ابتسامة من فاجأه الموت على حين غرة , ولسان حالها يقول :

يما !  شفتِ  الويل  لشفتيني ..

كيف  بهالسهولة  ضيعتيني  ..؟

Read Full Post »

Older Posts »