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Archive for the ‘قصص من زمن الحب’ Category

~¤¦¦  قلوب  عاشقه ¦¦¤~

بقلم : عابر  سبيل


الثانية  فجرًا.. هكذا  أعلنت  الساعة  المضيئة  في  الدوّار المقابل ..

على  بلكونة  فندق  يسمونه ” فندق الأندلس” , تطل على  شارع  يسمونه ” شارع  فرنسا ” , في  مدينة  حيثما  تجول  السائح  فيها  صادف  دراجات  نارية  وأشجار  نخيل .. جلست على  مقعد واطئ , عارية  تمامًا , يقطر شعرها  ماءً ,  بعد حمّام , تلف  جسدها  بغطاء  السرير الأبيض .. منهكة  حبًا ..

كان  وجهها  مشرقًا  في الضوء الخافت .. تردد  مطلع  قصيدة  له , حفظتها  عن  ظهر  قلب .. وتضحك  من قلبها , كما  لو أنها  تلك  الليلة , في  تلك  الغرفة  من  ذاك  الفندق , ولدت .!

فجأة .. بكلتا  يديها  شدت  الشرشف على  جسدها .. وطأطأت  رأسها , ليسمع  لها  نشيجًا  مباغتًا ..

بعض النساء قادرات  على تحويل  أجمل  لحظات  العمر  مأتمًا..!

قال  متعجبًا  :  ما  يبكيك  الآن ..؟

أجابت :  أبكي  لفرحي  الذي  أنا  فيه, لأني لا  أصدقه  !  وأبكي  لحزن  قادم  غدًا  أو  بعد  غد .. وقت  تأخذ  أنت  طائرة  نحو الشرق  إلى  بلادك ,  فيما  أستقل  أنا ,  بعدك , أخرى  نحو الشمال , إلى  بلاد  صارت  بلادي.. من  أين  جئت ..؟!  لماذا  تعثرت  بك ..؟!  كيف  أحببتك  كل  هذا  الحب في  أيام  قلائل ..؟!  كأنك سَحَرْتني .. ! أكان ينقصني  سبب  جديد  لأحبكم أهل فلسطين, فتجيئني  ..؟

لو  أنه  أمهل  نفسه  بضع  دقائق لأخذه  كلامها  في  نحيب  حقيقي .. ففي  قلبه , لأسباب لا  تكاد  تحصى , قابلية فظيعة  للانفطار ..

تدارك الموقف , كما  ليقطع  على  نفسه  الطريق .. مرر أصابعه  فوق  شعرها  المبلل  وقال , مبتسمًا :

عليك  من الله  ما  تستحقين..!  أهذا  وقته ..؟  عمومًا  لا تبتئسي .. كل  الذين  يلتقون , في  النهاية  يفترقون .. وإن  لم  يكن الموت  هو  ما يفرقهم , فهم  والله  بخير , لأنه  سيظل  عندهم , في  هذه  الحالة , أمل ,  مهما  كان  ضئيلا , في  ان  يعودوا  ليلتقوا  من  جديد .. !  قومي  بدلي   ثيابك .. أقصد  ارتدي  ثيابًا ,  لنخرج.

في  الطريق  شبه  الخاليه , متخاصرَين  يمشيان  باتجاه  المقهى  في  آخر الشارع , قالت , هذه المرة  نشوانة  فرحه :

أأقول لك  شيئًا ؟  في عينيك  بريق  يحتقر الدنيا ..  ينفذ  في  القلب  تمامًا .. لا  تعجب إن  أحبته  كل  النساء .. أكل الفلسطينيين مثلك ..!؟

محاولا  أن  يخفي  مرارة  مهيأة  دائمًا  للانفجار  في  داخله , كي  لا  يفسد  ساعات  الفجر  تلك , المختارة  منذ الأزل  لممارسة  الحب  أو  للصلاة ,  أجاب  :  أنا  والله  تلميذ  في  العشق  نسبة  إلى البقية .. فنحن  لهول  معاناتنا  صرنا  أساتذة  في  الحب .. وفي  الموت  أيضًا  !!

بعد  ثلاثة أيام .. على  المقعد  رقم c 51  في طائرة  البوينج  المتجهة  شرقا , كان  يعبث  بسلسلة  أهدته  إياها .. ينظر عبر  النافذة  الصغيرة ,  في الغيوم .. وقلبه  يبكي ..

هو غالبًا  يغادر كل  مدينة  يزورها .. باكيًا , تاركًا  وراءه  امرأة , هي  ايضًا , في  الغالب , تبكي ..

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~¤¦¦  غباء  رجل .. ¦¦¤~

بقلم: عابر سبيل

عزيزتي ..!

أترى  نعود  ونلتقي …؟

ليتنا  نلتقي  لو ساعتين , وبعدها  نموت , ولو  أمام الناس , متعانقين..

الآن.. بعد  فوات  الأوان .. أكتشف , أو  ربما  أنني  منذ  زمان  قد  اكتشفت , ولكن  أوان  البوح  جاء اليوم  كيما  اعترف ..

تأخرتُ  كثيرًا .. يا لغبائي ..

كيف ضيعتك  وكنت من دون أن  ادري , أضيّع  نفسي..!

يا لخيبتي …! كيف تكون  لي  مثلك .. ثم أمسي  هكذا ولا شيء معي ..!

يا  امراة  أصبحت ْ حين  يسكن  الكون , في  الليل , تكون  لي .. وحالما  يطلع  النهار , من  أول الفجر , ألقاها معقود  قرانها  على غيري..! ويغيب  صوتها  فلا  يظل  لي  منه  إلا  الصدى .. ومن  ومضة  العشق  في عينها  غير الظلال…! 

الآن  افهم  لماذا  بالضبط  أحببت  بلادًا  ليست  بلادي .. عشقت  أسماء  لم  تكن  من  قبل  تعنيني .. ورافقت اقوامًا  لم  يكونوا  مرة ً  أصدقائي ..

الآن  أدرك  معنى  انك  كنت ِ  وقت  تغيبين  تحببين  إليّ  إعتزال  الناس , ومن  غير  أن  أشعر , أفكر فيك ِ .. وحين  تجيئين  تخمد  ناري .. يتوه  تفكيري .. وينعقد  لساني ..!

يا  امرأة  مرت  في  صحراء  أيامي  كغيمة .. ليلة  بيضاء  في  أيام  عمري الأسود ..

كيف  لم  أفهم ؟!

نظراتك .. ابتساماتك .. إشاراتك ..  ومرات  ألقيت ِ  نفسك  في  طريقي  ثم  زعمتِ  أنها  مصادفه ..!

سهرت  ليلة  أمس  حتى  الفجر مع  أشيائك  عندي .. اعني  أشيائي  منك  ;  رسالتين  طويلتين .. وأشرطه .. ومنديل  نسائي .. وزجاجة عطر  نصف  فارغه .. استنطقتها .. لكنها  ظلت  صامته .. ولو  أنها  تكلمت , لقالت كلها :  يا  أغبى  الرجال  كيف  لم  تفهم..؟!

الآن , متأخرًا ,  أفهم  أن  المرأة  في الحب  تصير أكثر  شجاعة  وجرأة  من الرجال .. ولكنني  أفهم  ايضًا  أننا  قد  نكون  مصدر  عذاب  لآخرين  كل  ذنبهم  أنهم  أحبونا .. 

ما  أشقى  المرأة  تحب  رجلا  لا  ينتبه  لها …

ما  أغبى  الرجل  تحبه  امرأة  لا  يكتشفها  إلا  بعد  فوات  الأوان..!

أعرف  انه  فات  الوقت  لفعل أي  شيء  من  شأنه  محاولة  تصحيح  مسار الأشياء .. وانه  قد  لا  يكون  من الحكمة  أن  أرسل  إليك  خطابي هذا..  ولكن  ربما  يكون  اعترافي  الحالي  اقل  ما  استطيع  تقديمه  لك , ولو من باب إخبارك , أنه  قد  أتى  اليوم  دوري  لتجربة  العذاب ….

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~¤¦¦  رسالة  إلى  امرأة  بعيدة ..  ¦¦¤~

بقلم: عابر سبيل

حبيبتى  ..!  

لا  أعرف  والله  من  أين  بالضبط  أبدأ..  ثمة  مواضيع  عديدة  تطرح  نفسها  بقوة ,  وتطالبنى  بإلحاح , أن  أمر عليها .. ولكن أعذرينى , فظروفي  ليست  عاديّه .. الحقيقة  ظروفنا  لم  تكن  عاديّة  يومًا , لأننا  نعيش , منذ  ولدنا , تجربة  الخوف  وشد  العضلات  في  القلب  وبؤبؤ  العين..

يتغلغل  القلق  في  الأحشاء  ويخترق  العقل , ليحرمنا  ممارسة  إنسانيتنا  بشكل  طبيعى أو حر .. وليخيفنا  حد الموت , ويجعلنا  نحس  كما  لو أننا  نطل على العالم  من خلال  حلقات  قاتمه  متراكبة  من  ضباب .. فيصير التفكير  بكفاءة  مهمة  صعبه , ويغدو  ترتيب  الأفكار غاية  شبه  مستحيله ..

في  هذه ألحالة  يصبح الحلم  أعز  ما  نملك .. نمارسه  إلى  حد  الإدمان ..  

مسكين  هو  العاشق  الذي  عاش  حياته  كلها  يدمن  حلمًا..

 حبيبتي..!

أعترف أنني  هذه  الأيام  متعب  وحزين  فوق  العادة .  كل  شيء  أجده , في  الفترة  الأخيرة ,  فاترًًا  وثقيلا ..  لزجًا  على  القلب  مثل  لعاب  الرخويات ..

بصراحة  أحس  كأنني  محاصر  تمامًا .. كما  لو كنت  على  وشك  الرحيل  إلى  خارج  حدود  الكون.

تصوري  أنني  قد  فقدت  القدرة  على  التمييز  بين  نهد  جميل  وبين  حجر .. بين  وردة  على  طاولة  وأخرى على  قبر  قديم .. عيون  العمر مطفأة  كالقناديل  القديمة .. وعيناي  ما  ظل  منهما  غير  الظلال .. مفعمتان بالإنكسار  كعيني  سجين عرف  عفونة  ما وراء  القضبان ..

لقد  قصت  علينا  الجدات  المسنات , تحت  ضوء  القمر  ونيران  الأكواخ  البائسه .. أن على  الظهور  الملسوعه  بالسياط , يجلس  الوطن ..  ويبني  له  عشًا  كاليمامة ..  لكنهم  يا حبيبتي  لسعوا  ظهورنا  دهورًا .. جلسوا  فوقها .. واعتقلوا  الوطن.. جعلوه  ممرات  للخيبة  وللقبلات  المردودة  على  أعقابها .. وظلت  صبايانا  فوق  التلال  بغير  حلم  ومتعه .. أثداؤهن  ترن  كثمر  الخشخاش  في  الريح ..  ورحل  المطر .. ومعه  الأمل .. وبقينا  ننتظر , مرغمين , طائر  الخريف  يجيء  يحمل  بين  قوادمه  رسالة ,  كتبت  بحروف  النار ,  ليخبر أن  الموت  قادم.

كأنني  أرى  الآن  عينيك  دامعتين  وقلبك  مفخخ  بالحيرة .. لا  بأس  حبيبتي .. فأنا  من  سنين  حاولت  تعليم  العيون  السود  تربية  الحمام .. فشلت ُ..  فقلت ُ : لا  بأس .. غدًا  لمّا  يحط  على  شباكها  قمر  يتيم .. أو ترى  حبق  البيوت  يصير  للحزن   إلهًا .. سوف  تدرك  معنى  أن  نعيش  رهائن  الحلم .. ونحيا  العجز  والذكرى .. كأشباح  تدق  قلوبنا  في  الليل  غاضبة .. ولكن  العيون  السود  خدعتني .. وظل  غباؤها  قدرًا  يعاديني .. يعاندني .. ويشجيني .. إلى  الآن ..

أذكر  طبعًا  أنني  جئتك  ذات  يوم  مطاردً ا.. مهزومًا .. مثل  ملك  مخلوع .. أتيت  أتعلم  في  صدرك  لغات  الخيول .. أو  لأقطف  في  عينيك  اقمارًا .. وأبحث  عند  ثغرك  على  أنشودة  عشق  أو  موسم  خصب .. يضع حدًا لفصول  شقائي ..

أما زالت عيناك  جميلتين .. وساحرتين .. وناعستين ..  وقاتلتين ..؟

وحضنك ..؟  ألم  يزل  له  الدفء  الذي  ذات  زمان  كان  يصهرني .. ويعيد  كل  مرة  من  جديد ,  تشكيلي  ..؟!!

 تدرين ..؟  أنا  قد  رأيتك  بالأمس  في  حلمي .. وكان  على  جبينك  قمر .. ورأيت  في  عينيك  أنهارًا  وغابات  نخيل .. كانت  على  شفتيك  كروم  لوز أزهرت ..  بيضاء  كوجه ملاك .. وزهرية  كقمصان  نوم  نساء  آلهة  الإغريق ..

كنت  شهية .. كما  يليق  بأنثى  حقيقيه..

لا  أذكر  كيف  بالضبط  دخلت .. رأيتك  فجأة  أمام  سريري .. كان  شعرك  منفوشًا  بعض  الشيء , بفعل  الريح .. وكانت  تحت إبطك  سندويتشات وجرائد .. ألقيتِ  بأشيائك  على  البلاط .. وانحنيتِ  فوقي  تأخذين  شفتيّ  في  رحلة  حول  أنهار  الجنه ..

لماذا  النساء  في  الحلم أكثر  رقة  وحنانًا  ودفئًا  وشاعرية  منهن  في  الواقع ..؟!  ألأننا  نحن  الرجال  نتمناهن  كذلك  ؟  أم  لأنهن  في  الحلم  طبيعيات  وحرات  أكثر..؟!

على  أية  حال , قد  واظبت  حبيبتي , إلى  الآن ,  على  أن  أكون  وفيّا , كما  يليق  بمثلي , لأتواصل ,  بشكل أو  بآخر ,  معك..  إلا  أني  قد  أتغيب  هذه  الأيام , قسرًًا , لمدة  قد  تطول .. فإن  كان , لا   تقلقي .. لأن  جميع  الذين  يغيبون  يعودون  في آخر  الأمر ..  ولو  جثثًا  في  التوابيت..

وأنا, إن  لم  أمت ,   فإنني  حتمًا   سأعود..

أما  لو  مت , فسترجع  روحي  ترفرف  في  بهيم الليل,  حول  بيتك , تبحث  عن  منفذ  لتدخل .. لهذا  اتركي , لو  سمحت ,  شباك  حجرتك , في  الليل , مفتوحًا..

 

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